चंचल सिंह —
वाराणसी—धर्म और आध्यात्म की नगरी काशी में शारदीय नवरात्र की शुरुआत होते ही देवी मंदिरों में श्रद्धा और भक्ति का माहौल दिखाई देने लगा है. नवरात्र के पहले दिन बुधवार को अलईपुर स्थित मां शैलपुत्री मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी. सुबह से ही भक्तों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया. हाथों में नारियल, फूल-माला और पूजा सामग्री लेकर श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए अपनी बारी का इंतजार करते नजर आए। पूरा मंदिर परिसर ‘जय माता दी’ के जयकारों से गूंज उठा.
नवरात्र के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना का विशेष विधान है. मान्यता है कि मां शैलपुत्री की आराधना करने से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख, समृद्धि, यश, कीर्ति तथा विद्या की प्राप्ति होती है. श्रद्धालु मां के दरबार में परिवार की खुशहाली, देश में सुख-शांति और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करने पहुंचे.
पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं मां शैलपुत्री —
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में अवतरित हुई थीं. इन्हें मां दुर्गा के नौ स्वरूपों में प्रथम माना जाता है. मान्यता है कि आगे चलकर मां शैलपुत्री ने पार्वती के रूप में भगवान शिव की अर्धांगिनी बनने का गौरव प्राप्त किया. मां शैलपुत्री को शक्ति, साहस और प्रकृति का प्रतीक भी माना जाता है.
वरुणा नदी के किनारे स्थित है प्राचीन मंदिर —
वाराणसी के अलईपुर क्षेत्र में वरुणा नदी के किनारे स्थित मां शैलपुत्री का मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है. नवरात्र के पहले दिन यहां दर्शन करने की विशेष मान्यता है. इसी कारण हर साल नवरात्र के दौरान बड़ी संख्या में भक्त मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मंदिर में उमड़ी भीड़ के बीच श्रद्धालु कतारबद्ध होकर अपनी बारी का इंतजार करते रहे और विधि-विधान से पूजा-अर्चना की.
नौ दिनों तक होगी मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना —
शारदीय नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की अलग-अलग पूजा-अर्चना की जाती है. पहले दिन मां शैलपुत्री, दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी और इसी क्रम में नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है. नवरात्र के दौरान मंदिरों में विशेष पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है। काशी में नवरात्र के पहले दिन उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया.









