चंचल सिंह —
चंदौली—दुर्गा पूजा का पर्व करीब आते ही पीडीडीयू नगर की सेंट्रल कॉलोनी में मिट्टी में आस्था के रंग भरने लगे हैं. कहीं मिट्टी को गूंथा जा रहा है तो कहीं प्रतिमाओं के चेहरे को अंतिम रूप दिया जा रहा है. कोलकाता से आए करीब 15 कारीगर मां दुर्गा की प्रतिमाओं को आकार देने में जुटे हैं. इन्हीं कारीगरों के बीच किनाराम पाल ऐसे शिल्पकार हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी के करीब 53 वर्ष मूर्तिकला को दे दिए. महज 15 वर्ष की उम्र में शुरू हुआ उनका सफर आज भी उसी जुनून के साथ जारी है.
15 की उम्र में शुरू हुआ सफर, पांच दशक बाद भी जारी हुनर —
पश्चिम बंगाल के कोलकाता निवासी किनाराम पाल बताते हैं कि जब उन्होंने 15 वर्ष की उम्र में मूर्ति बनाने का काम शुरू किया था, तब परिस्थितियां बिल्कुल अलग थीं. मूर्ति बनाने के लिए मिट्टी कई जगह आसानी से उपलब्ध हो जाती थी. संसाधन सीमित थे, लेकिन कला के प्रति लगाव ने उन्हें इस काम से जोड़े रखा. धीरे-धीरे यही हुनर उनकी पहचान बन गया. 53 साल बाद भी उनके हाथ मिट्टी को आकार देने में वैसे ही सक्रिय हैं.
एक ट्रैक्टर मिट्टी में तैयार होते हैं दो सेट —
किनाराम पाल बताते हैं कि समय के साथ मूर्ति बनाने की लागत तेजी से बढ़ी है. 1990 के दशक में करीब 10 रुपये की मिट्टी में दो सेट प्रतिमाएं तैयार हो जाती थीं. अब एक ट्रैक्टर मिट्टी की कीमत करीब 3500 से 4000 रुपये तक पहुंच गई है. पिछले वर्ष यही मिट्टी लगभग 2500 से 3000 रुपये में मिल जाती थी. मिट्टी के अलावा लकड़ी, रंग और अन्य सामग्री के दाम बढ़ने से प्रतिमाओं की लागत भी बढ़ी है.

40 सेट का ऑर्डर, कई जिलों तक पहुंचेगी प्रतिमाएं —
सेंट्रल कॉलोनी में इस बार अब तक करीब 40 सेट मां दुर्गा की प्रतिमाओं का ऑर्डर मिल चुका है. एक सेट में शेर पर सवार मां दुर्गा के साथ मां लक्ष्मी, मां सरस्वती, भगवान गणेश, कार्तिकेय और महिषासुर की प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं. यहां बनने वाली प्रतिमाएं मुगलसराय, चकिया, सादुल्लापुर, बबुरी, सैयदराजा, चंदौली और वाराणसी के विभिन्न पूजा पंडालों तक पहुंचेंगी.
दुर्गा पूजा ही नहीं, हर पर्व के लिए तैयार होती हैं प्रतिमाएं —
सेंट्रल कॉलोनी के कारीगर सालभर अलग-अलग पर्वों के लिए प्रतिमाएं तैयार करते हैं. दुर्गा पूजा के अलावा सरस्वती पूजा, विश्वकर्मा पूजा, रविदास जयंती, गणेश पूजा और लक्ष्मी पूजा के लिए भी प्रतिमाएं बनाई जाती हैं. इस बार तैयार हो रही प्रतिमाओं की कीमत करीब पांच हजार से 50 हजार रुपये तक है। कारीगरों के अनुसार प्रतिमा का आकार, डिजाइन और सजावट के हिसाब से कीमत तय होती है.
महंगाई के साथ बारिश ने बढ़ाई परेशानी, फिर भी नहीं थमे हाथ —
कारीगरों के सामने इस बार दोहरी चुनौती है. एक तरफ मिट्टी और निर्माण सामग्री के दाम बढ़ने से लागत बढ़ी है तो दूसरी तरफ बारिश के कारण प्रतिमाओं को सुखाने में परेशानी हो रही है. प्रतिमाओं को रंग-रोगन से पहले पूरी तरह सुखाना जरूरी होता है. मौसम साथ न देने के बावजूद कारीगर समय पर ऑर्डर पूरा करने में जुटे हैं. मिट्टी से आकार लेती प्रतिमाओं के बीच किनाराम पाल की 53 साल पुरानी कला परंपरा आज भी जीवित है, जो हर साल आस्था के पर्व से पहले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाती है.










